सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी रेगुलेशन 2026 पर उठाए चार सवाल, जाति-आधारित भेदभाव पर स्पष्टीकरण मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2026 के इक्विटी विनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कई जरूरी कानूनी सवाल उठे हैं। कोर्ट ने इन सवालों पर विचार करने के लिए चार मुख्य प्रश्न तैयार किए हैं।
अदालत ने परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए हाल ही में पारित यूजीसी के समानता संबंधी नियमों पर रोक लगा दी है, यह कहते हुए कि ढांचा “प्रथम दृष्टया अस्पष्ट” है, इसके “बहुत व्यापक परिणाम” हो सकते हैं और अंतत: यह समाज को “खतरनाक प्रभाव” के साथ विभाजित कर सकता है।
विनियमन 3(1)(सी) के अनुसार “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा में “केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के खिलाफ जाति के आधार पर भेदभाव” का उल्लेख किया गया है।
विनियम 3(1)(ई) के अनुसार, “भेदभाव” को अधिक व्यापक रूप से “धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता, या इनमें से किसी के आधार पर किसी भी हितधारक के खिलाफ अनुचित, भिन्न या पक्षपातपूर्ण व्यवहार या ऐसा कोई भी कार्य, चाहे वह स्पष्ट हो या निहित” के रूप में परिभाषित किया गया है।
न्यायालय ने गौर किया कि विनियमों में केवल “भेदभाव” के संबंध में ही उपचारात्मक उपाय दिए गए हैं, जिसमें जाति आधारित भेदभाव भी शामिल है। इस संदर्भ में, न्यायालय ने आश्चर्य व्यक्त किया कि “जाति आधारित भेदभाव” को अलग से क्यों परिभाषित किया गया है।
न्यायालय ने आगे यह भी बताया कि “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा में सबसे पिछड़े वर्ग और अति पिछड़े वर्ग को इंगित नहीं किया गया है।
न्यायालय की अगली चिंता विनियम 7()ि में प्रयुक्त शब्द “पृथककरण” के संबंध में थी। यह खंड उच्च शिक्षा संस्थानों को निर्देश देता है कि वे यह सुनिश्चित करें कि छात्रावासों, कक्षाओं, मार्गदर्शन समूहों या किसी अन्य शैक्षणिक उद्देश्य के लिए किया गया कोई भी चयन, पृथक्करण या आवंटन पारदर्शी, निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण हो। न्यायालय ने प्रश्न उठाया कि क्या यह कक्षाओं और छात्रावासों में जाति-आधारित पृथक्करण का आदेश है जो भाईचारे की भावना का उल्लंघन करता है।
इसके बाद न्यायालय ने नियमों से रैगिंग को बाहर रखे जाने पर सवाल उठाया। याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए न्यायालय ने नियमों को स्थगित रखने का भी आदेश दिया।




