व्यापार

क्या ग्रीन स्टील का इस्तेमाल होने से कार्बन उत्सर्जन हो रहा कम?

नई दिल्ली। सरकारी परियोजनाओं में 26 प्रतिशत ग्रीन स्टील का इस्तेमाल अनिवार्य होने से साल 2030 तक 20.9 मिलियन टन कार्बन डाइआॅक्साइड का उत्सर्जन कम किया जा सकता है। अगर ग्रीन स्टील की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत हो जाए तो इसके बाद 29.7 मिलियन टन कार्बन डाइआॅक्साइड उत्सर्जन से बचा जा सकता है। यह हर वर्ष लगभ 90 लाख कारों को सड़कों से हटाने के बराबर है। यह जानकारी कन्फेडरेशन आॅफ इंडियन इंडस्ट्री यानी सीआईआई व क्लाइमेट कैटालिस्ट की ओर से गुरुवार को जारी आकलन रिपोर्ट में आए हैं।
सीआईआई के कार्यकारी निदेशक और ग्लोबल इकोलेबलिंग नेटवर्क बोर्ड के अध्यक्ष के. एस. वेंकटगिरी ने कहा कि ‘ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट भारत के इस्पात क्षेत्र को कम कार्बन उत्पादन की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
क्लाइमेट कैटालिस्ट की निदेशक साक्षी बलानी ने कहा, ग्रीन स्टील को लेकर एक मजबूत आदेश भारत के इस्पात क्षेत्र को किसी भी सब्सिडी या तकनीकी प्रोत्साहन से तेज गति से बदल सकता है। ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट ही कार्बन उत्सर्जन घटा सकता है, बड़े पैमाने पर निवेश खोल सकता है।
इससे जुड़ी खास बातें
अगर इस्पात मंत्रालय साल 2028 में 26 प्रतिशत खरीद अनिवार्य कर दे तो 93 प्रतिशत इस्पात कंपनियां प्रमाणित ग्रीन स्टील के लिए तैयार है।
अभी सार्वजनिक खरीद पर प्रतिवर्ष लगभग 45-50 लाख करोड़ रुपये खर्च कर लगभग 3.16 करोड़ टन स्टील की खपत होती है।
प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी 2.0, मेट्रो रेल परियोजनाएं और रेल परियोजनाओं में ग्रीन स्टील के उपयोग से परियोजना लागत केवल 0.2 प्रतिशत से 1.2 प्रतिशत तक बढ़ती है।
ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट इस दशक में भारत के इस्पात क्षेत्र की जलवायु महत्वाकांक्षाओं को ठोस और मापने योग्य कार्रवाई में बदलने का सबसे प्रभावी साधन है।

Related Articles

Back to top button