मथुरा

गोवर्धन के मुखारबिंद मंदिर में पुरोहितों ने खेली होली:रसिया गाकर भगवान को रिझाया, थाप की धुन पर थिरके भक्त

मथुरा । होली सभी जगह खेली जाती है लेकिन ब्रज में इसकी बात ही निराली है। यहां रंग,गुलाल,लड्डू जलेबी के अलावा अंगारों से होली खेली जाती है। इसके अलावा यहां होली के पदों का गायन भी होता है। मंदिरों में भगवान के समक्ष होली के पद गाए जाते हैं और भगवान को रिझाया जाता है। मथुरा के गोवर्धन स्थित जातिपुरा मुकुट मुखारबिंद मंदिर पर वहां के पुरोहितों ने होली के रसिया का गायन किया।
ब्रज में होली खेली ही नहीं गाई भी जाती है। अलग अलग मंदिरों में पुजारी,पुरोहित भगवान के समक्ष अलग अलग होली के पद गाए हैं। गोवर्धन के जातिपुरा स्थित प्रमुख मुकुट मुखारबिंद मंदिर में रविवार की देर शाम से होली के पद गायन की शुरूआत हुईं। होली के इस पद गायन को रसिया कहा जाता है। जिसमें पुरोहित भगवान को पद गाकर सुनाते हैं और उनको रिझाते हैं।
पुरोहित समाज के लोग मुकुट मुखारबिंद मंदिर पर एकत्रित हुए। यहां भगवान के विश्राम पर होली के पदों का गायन शुरू हुआ। थाप बजाते हुए यह लोग होली के पद गाने लगे। करीब एक घंटे तक यहां भगवान को होली के पद सुनाए गए। इस दौरान रंग,गुलाल का प्रयोग नहीं किया गया। यह सिलसिला अब यहां होलिका दहन तक चलेगा।
पदों पर थिरके भक्त
ब्रज में होली के पदों का गायन किया जा रहा था तो परिक्रमा दे रहे भक्त अपने को थिरकने से नहीं रोक सके। होली के पदों पर भक्तों ने जमकर नृत्य किया और खूब आनंद उठाया। यहां प्रतिदिन इसी तरह होली का गायन होगा। इन पदों के जरिए पुरोहित समाज के लोग कभी भगवान कृष्ण को तो कभी राधा रानी को रिझाते हैं। जिसके बाद खेली जाती है ब्रज की प्रसिद्ध होली।
बसंत पंचमी से शुरू होती है ब्रज में होली
ब्रज के मंदिरों में होली के पद का गायन अलग अलग सम्प्रदाय के अनुसार होता है,लेकिन रंग,गुलाल की होली की शुरूआत सभी मंदिरों में बसंत पंचमी से हो जाती है। इस दिन मंदिरों में भगवान को गुलाल लगाने के बाद प्रसादी गुलाल भक्तों पर डाला जाता है। ब्रज में होली का समापन रंगनाथ भगवान के भक्तों के होली खेलने के साथ होता है। जिसमें लट्ठमार, लड्डूमार,रंग,गुलाल,अंगारों सभी तरह की होली होती है।

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