अपने ‘घर’ की समस्या का समाधान निकाल सकेंगे नितिन नवीन? भाजपा अध्यक्ष के राज्य में संगठन असंगठित!

विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बिहार से बनना, राजनीतिक रूप से जागृत बिहार के लोगों के लिए गर्व का विषय है। जब पटना में पले-बढ़े और पढ़े जगत प्रकाश नड्डा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तो भी बिहार गौरवान्वित था। इस बार तो बिहार के मूल निवासी नितिन नवीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं। भाजपा ने बिहार के लोगों को इस निर्णय से बड़ा संकेत दिया है। लेकिन, अब सवाल यह भी है कि क्या नितिन नवीन अपने ‘घर’, यानी बिहार भाजपा की समस्या का समाधान भी निकालेंगे या इसमें हाथ डालने के खतरे से बचेंगे? सवाल इसलिए भी, क्योंकि उन्हें समस्या की जानकारी बहुत अच्छे तरीके से है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले भी भाजपा बिहार में सबसे बड़ी पार्टी थी। वह 2020 के चुनाव में 74 सीटें जीतकर आई थी, लेकिन 2025 के आम निर्वाचन से पहले उसकी संख्या 80 विधायकों वाली थी। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भाजपा को 89 सीटें मिलीं। वास्तव में उसे नौ सीटों का ही फायदा मिला। विधानसभा में वह सबसे बड़ी पार्टी है। उसके ठीक पीछे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में उसके सहयोगी व राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाईटेड है। जदयू के 85 विधायक हैं।
243 सीटों वाली बिहार विधानसभा के चुनाव में जीत के कई कारणों में विपक्ष का कमजोर और राह से भटकना भी था। लेकिन, जीत तो जीत है। वह भी बड़ी। इसलिए, आंतरिक संकट बाहर नहीं आया। अगर यह संख्या गिरती तो जो कुछ सामने आता, वह भाजपा प्रदेश मुख्यालय के आसपास रहने वाले तमाम नेता, विधायक, सांसद जानते हैं। जीत से वह समस्या दब जरूर गई है, लेकिन उसका समाधान नहीं हुआ है।
2014 के बाद की भाजपा बदली हुई है, यह हर कोई मानता है। मानने की वजह अलग-अलग है। बदली हुई भाजपा में विरोध नहीं होता है, खुलकर। यही कारण है कि दूसरे दल से सम्राट चौधरी आए, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बने, फिर वित्त मंत्री के साथ उप मुख्यमंत्री बन गए और कोई हंगामा बाहरी तौर पर नहीं हुआ। भाजपा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् जैसे संगठनों से होकर बड़े ओहदे तक पहुंचे लोगों के बीच सम्राट चौधरी अब भी जगह ही बना रहे हैं।
बिहार विधान सभा के अंदर तत्कालीन अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा को तत्कालीन पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी ने सदन में ही कहा था- “ज्यादा व्याकुल नहीं होना है।” विजय कुमार सिन्हा- “शब्द वापस लीजिए” बोलते रहे। जिस समय सम्राट यह बोल रहे थे, तत्कालीन सरकार के मंत्री नितिन नवीन खुद सम्राट चौधरी की बायीं तरफ हतप्रभ होकर यह सब देख-सुन रहे थे। बाद में बाहरी तौर पर सम्राट-विजय में ठीक होने की बात कही गई, लेकिन इस समस्या का अब तक समाधान नहीं मिला है। वजह यह कि यह समस्या सिर्फ सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा के बीच की नहीं। जब-जब दोनों ध्रुवों में बाहरी तौर पर खींचतान होता दिखता है, वह वीडियो विपक्ष वायरल कर देता है।
दरअसल, यह गैर-भाजपाई और मूल-भाजपाई का अंतर्विरोध अंतर्कलह के रूप में है, लेकिन नई भाजपा में कोई मुखर होकर यह बात नहीं कहता है। यहां तक इस बारे में बात करने पर भी कोई बयान नहीं मिलता। बस यही कहा जाता है कि सब ठीक है, मीडिया को ही दिक्कत नजर आती है। लेकिन, हकीकत यह है कि बिहार के इस अंतर्विरोध की जानकारी भाजपा मुख्यालय को भी है। यही कारण है कि दोनों ध्रुवों को उप मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गई। दोबारा सरकार बनी तो एक को बदलने की बात कही जाती रही, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। किसी बात पर एक का पलड़ा भारी तो किसी मुद्दे पर दूसरे को मजबूत दिखाकर काम चलाया जा रहा है।
बिहार भाजपा के अंदर जातिगत भागीदारी को लेकर भी कलह है। यह मुद्दा बहुत पुराना है। 2014 के पहले भी था और अब भी है। पहले यह बात उभर कर सामने आ जाती थी, अब नहीं आती है। वजह वही है- नई भाजपा। यही कारण है कि राजपूत विधायकों-नेताओं के अंदर बिहार भाजपा के नए मंत्रिपरिषद् को लेकर गुस्सा है, लेकिन सामने नहीं आता है। इकलौते कायस्थ विधायक नितिन नवीन मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके हैं। बिहार चुनाव में पटना की कुम्हरार सीट कायस्थों से छिनने का आक्रोश इसी तरह दब गया। बिहार भाजपा में भूमिहार मजबूत तो हैं, लेकिन आंतरिक टकराव के साथ। ऐसे कई मुद्दे हैं और लगभग सभी को भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन करीब से देखते-जानते हैं।
अब तक किसी ने हाथ नहीं लगाया है। जानकारी सभी को है। सभी समस्याओं का समाधान भी संभव नहीं है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी थे, लेकिन पार्टी के बहुत सारे फैसलों में उनका प्रभाव नहीं दिखता था। भाजपा ने विरोधों के कई स्वर को जैसे पहले दबाया, बिहार में संगठन के अंदर शीर्ष पर चल रहा गतिरोध भी दबने के लिए छोड़ा जा सकता है। सुशील कुमार मोदी को बिहार के उप मुख्यमंत्री नहीं बनाने के फैसला भी एक वजह था कि 2020 के जनादेश के बावजूद नीतीश कुमार बाद में अलग हो गए थे।
प्रदेश भाजपा के अंदर इसपर बहुत हंगामा था, लेकिन तब भी केंद्रीय नेतृत्व ने दूसरा रास्ता निकाल ही लिया। अब भी, जब नितिन नवीन को अचानक राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की घोषणा हुई तो भाजपा में एक बड़ा हिस्सा इसे अंतर्मन से स्वीकार नहीं कर रहा था, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने साफ संदेश दिया कि ‘नितिन नवीन भाई’ से काम नहीं चलेगा और अब तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में सामने आते ही प्रधानमंत्री ने ही ‘बॉस’ कहकर दो टूक बात कह दी। जहां तक सवाल नितिन नवीन के हाथ लगाने का है तो वह फिलहाल इससे दूर रहना चाहेंगे, क्योंकि सामने पश्चिम बंगाल चुनाव के साथ पूरे देश में संगठन की जिम्मेदारी है। बिहार में अटकेंगे तो कहीं न कहीं बात बढ़ने का डर रहेगा, जो नई भाजपा की परंपरा नहीं रही है।




