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चीन और जापान के बीच तनाव बढ़ा, निर्यात पर नए नियम लागू होने से टोक्यो की खेपों में देरी

बीजिंग। चीन और जापान के बीच लंबे समय से विवाद रहा है। दोनों देशों के संबंधों में इस शुक्रवार को यह तनाव और बढ़ गया। दरअसल, टोक्यों में चीन के राजदूत ने जापान की निर्यात प्रतिबंधों को हटाने की मांग को ठुकरा दिया। वहीं, जापान ने कहा कि इस आपसी विवाद की वजह से चीन भेजे जाने वाली खेपों की आपूर्ति में देरी हो रही है।
चीन ने स्पष्ट तौर पर जापान के प्रति अपनी नाराजगी जताई है और अपने सामानों के निर्यात पर नए नियम लगाए हैं। इसके अलावा, जापान पर सैन्य ताकत बढ़ाने का आरोप लगाया। हालांकि, इसी बीच चीन ने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति के दौरे के दौरान उनके साथ नजदीकियां बढ़ाई हैं।
उधर, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख अखबार पीपुल्स डेली ने भी जापान पर शुक्रवार को तीखा हमला किया है। उसके संपादकीय में कहा गया, नया सैन्यवाद (सेना की ताकत पर जोर देना) जापान को फिर से विनाश की ओर ले जाएगा। इतिहास एक सख्त चेतावनी देता है। लेकिन जापान का दक्षिणपंथ फिर वही पुराने तरीके दोहरा रहा है।
यह बयान ऐसे समय में आया है, जब चीन पिछले कई दिनों से जापान की कड़ी आलोचना कर रहा है। दोनों देशों के बीच तनाव नवंबर में तब शुरू हुआ था, जब जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने कहा था कि अगर चीन ताइवान पर सैन्य बल का इस्तेमाल करता है, तो जापान देने से इनकार नहीं करेगा। चीन ताइवान को अपना क्षेत्र मानता है और कई बार दोहरा चुका है कि जरूरत पड़ने पर वह बल प्रयोग करेगा। पिछले महीने उसने ताइवान के पास बड़े सैन्य अभ्यास भी किए थे।
जापान में चीनी दूतावास ने गुरुवार रात कहा कि उसने जापान के विदेश मंत्रालय की उस मांग को खारिज कर दिया है जिसमें ‘दोहरे इस्तेमाल की वस्तुओं’ पर लगाए गए नए निर्यात नियम हटाने को कहा गया था। इन वस्तुओं का इस्तेमाल जापानी सेना हथियारों में कर सकती है। चीनी राजदूत वू जियांगहाओ ने कहा कि यह कदम ‘पूरी तरह वैध, उचित और कानून के अनुरूप’ है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है।
शुक्रवार को जापानी अधिकारियों ने कहा कि वे इस पर नजर रखे हुए हैं कि जापान से भेजे जाने वाले कृषि उत्पाद, मछली और अन्य सामान समय पर चीन में पहुंच रहे हैं या नहीं। जापान की समाचार एजेंसी क्योदो ने बताया कि कूटनीतिक तनाव के कारण जापान से चीन भेजी जाने वाली साके (जापान की पारंपरिक शराब) और प्रसंस्कृत खाद्य सामग्री की खेपें रुकी हुई हैं। इससे विवाद का असर और फैल गया है। व्यापार जगत के सूत्रों के हवाले से क्योदो ने कहा कि ये खेपें चीन की सीमा शुल्क प्रक्रिया में अटकी हुई हैं। कुछ जानकारों के अनुसार, ऐसा हो सकता है कि चीन ने साके को जापान का प्रतीक मानकर रोक दिया हो।
जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरु किहारा ने कहा कि उन्हें ऐसी खबरों की जानकारी है कि जापान के कुछ निर्यात चीन में रुके हुए हैं। उन्होंने किसी खास व्यापारिक सौदे पर टिप्पणी करने से इनकार किया। किहारा ने कहा, यह जरूरी है कि जापान से कृषि, मछली और अन्य निर्यात सुचारू रूप से हों। हम स्थिति पर करीबी नजर रखेंगे और जरूरी कदम उठाएंगे। उन्होंने यह नहीं बताया कि वे कदम क्या होंगे।
इतिहास में जापान और चीन के संबध तनावपूर्ण रहे हैं। 1895 में जापान ने ताइवान पर कब्जा किया था। दोनों देशों के बीच दो युद्ध हुए हैं और 20वीं सदी की शुरूआत में जापान की शाही सरकार ने चीन के कई हिस्सों पर कब्जा किया था। आज दोनों देशों के कूटनीतिक संबंध हैं और कई क्षेत्रों में वे साथ काम भी करते हैं, लेकिन विवाद होने पर वे एक-दूसरे की आलोचना करने से पीछे नहीं हटते।
पीपुल्स डेली के संपादकीय और अन्य बयानों में इस्तेमाल की गई भाषा पर खास ध्यान गया। इसमें पूरे जापानी लोगों को निशाना नहीं बनाया गया, बल्कि देश के दक्षिणपंथियों को निशाना बनाया गया, जिससे ताकाइची जुड़ी हैं। गुरुवार को जापान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर आई एक रिपोर्ट में बार-बार दक्षिणपंथ का जिक्र किया गया। पीपुल्स डेली के संपादकीय में ‘शांति पसंद जापानी लोगों’ से अपील की गई कि वे अपनी सरकार के प्रति ‘बहुत सतर्क’ रहें। अखबार ने कहा, जापान का भविष्य दक्षिणपंथ की खतरनाक कल्पनाओं में नहीं है, बल्कि अपने आक्रामक इतिहास का ईमानदारी से सामना करने में है।

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