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ट्रंप के आत्मघाती निर्णय ने भारत को महाशक्ति बनने का अवसर दिया, पश्चिमी देशों का मोदी का समर्थन।

ट्रम्प का आत्मघाती कदम भारत को एक महाशक्ति बनने का मौका

वर्तमान में, अमेरिका का भारत के प्रति रवैया बहुत बदल गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में, प्रशासन ने भारत के साथ पिछले 25 वर्षों की रणनीतिक निकटता को चुनौती देने वाला एक नया स्वरूप اختیار किया है। हाल के समय में, अमेरिकी मंत्रियों और अधिकारियों के बयानों से यह स्पष्ट होता है कि व्हाइट हाउस ने भारत पर दबाव डालने के लिए एक नया संघर्ष शुरू किया है। इस पृष्ठभूमि में, भारतीय विदेश नीति की दिशा और वैश्विक कूटनीति में उसके स्थान पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

अमेरिकी प्रशासन की नई नीतियाँ

हाल ही में, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों से अपील की कि वे भारत पर टैरिफ बढ़ाएँ। यह शाब्दिक रूप से भारत पर दबाव बनाने का एक प्रयास है। उन्होंने कहा, “हमें यूरोपीय भागीदारों से अधिक समर्थन की आवश्यकता है। वे भारत को धमकी क्यों नहीं दे रहे हैं?” यह बयान भारतीय व्यापार पर नए दबाव का संकेत है और अमेरिकी प्रशासन के बुनियादी उद्देश्य को उजागर करता है।

बेसेंट ने यह भी संकेत दिया कि यदि भारत किसी प्रकार के समझौते को स्वीकार नहीं करता है, तो ट्रम्प प्रशासन ठोस कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेगा। साथ ही, ट्रम्प प्रशासन ने भारतीय नागरिकों के लिए वीजा प्रतिबंधों को कड़ा कर दिया है, यह कहते हुए कि भारत वीजा के दुरुपयोग का सबसे बड़ा स्रोत है। इस कदम ने भारतीय समुदाय में चिंता बढ़ा दी है।

भारत को पश्चिमी देशों का समर्थन

ट्रम्प प्रशासन के इस नए रवैये की पश्चिमी बुद्धिजीवियों द्वारा तीव्र आलोचना की जा रही है। पूर्व अमेरिकी राजनयिक एवन फिगनबॉम ने कहा, “रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहना हास्यास्पद है। यह 25 साल की मेहनत से बने अमेरिका-भारत संबंधों को बर्बाद करने जैसा है।” यह टिप्पणी इस बात को उजागर करती है कि कैसे अमेरिका अपने पुराने दोस्तों को छोड़कर नए संघर्षों में उलझ गया है।

इसके अतिरिक्त, द इकोनॉमिस्ट जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ यह टिप्पणी कर रही हैं कि अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान की ओर है, जबकि भारत के प्रति उसकी नीतियाँ जोखिम भरी हो रही हैं। पत्रिका के अनुसार, “भारत पर रूस से तेल खरीदने के लिए विशेष सजा, अमेरिका के दोहरे मानदंडों का उदाहरण है। अमेरिका के लिए भारत से दूरी बनाना एक गंभीर गलती है। वहीं, भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह अपनी महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को साबित कर सके।”

अर्थशास्त्री की चेतावनी

इस संदर्भ में, अर्थशास्त्री रिचर्ड वुल्फ ने कहा, “अगर अमेरिका भारत को अलग कर देता है, तो भारत अमेरिका से अपनी निर्यात क्षमता को हटा देगा और ब्रिक्स देशों की ओर रुख करेगा। यह कदम न केवल ब्रिक्स को मजबूत करेगा, बल्कि पश्चिम की कमजोरी को भी उजागर करेगा।” यह एक संभावित परिदृश्य है, जहाँ भारत नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन सकता है।

भारत का अवसर

हालांकि अमेरिका से दबाव और आलोचना बढ़ रही है, लेकिन कई पश्चिमी बुद्धिजीवी और विश्लेषक मानते हैं कि यह भारत के लिए एक सुनहरा अवसर है। भारत अब अपनी स्थिति को और मजबूत करने के लिए कई रास्तों पर आगे बढ़ सकता है।

एक प्रमुख रणनीति यह है कि भारत चीन के साथ संतुलन बनाने की दिशा में आगे बढ़े। इसके साथ-साथ, यूरोप और एशिया में नए बाजारों तक पहुँचने और घरेलू सुधारों को लागू करने के लिए भारत को अपनी क्षमताओं का विस्तार करना होगा।

भारत के पास अद्वितीय संसाधन और जनसंख्या है, जो इसे एक महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हो रही है, जो वैश्विक आर्थिक बदलाओं के साथ तालमेल बैठाने के लिए महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

अंततः, यह स्पष्ट है कि ट्रम्प प्रशासन का नया दृष्टिकोण भारत के लिए एक चुनौती और एक अवसर दोनों प्रस्तुत करता है। अगर भारत इस चुनौती का सामना कर सकता है और वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति को मजबूत कर सकता है, तो यह केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

जिस तरह से विश्व स्थितियाँ बदल रही हैं, उस पर नजर रखते हुए भारत को समझदारी से अपनी कूटनीति विकसित करनी होगी। इस समय का सही इस्तेमाल करके, भारत न केवल अपनी महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को पूरा कर सकता है, बल्कि एक संतुलित और स्थायी विश्व व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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