शाहजहांपुर आत्मघाती मामले में परिवार का कर्ज और औद्योगिक केंद्र द्वारा अनुदान रोकने का खुलासा

एक दुखद कहानी: शाहजहानपुर के व्यवसायी सचिन ग्रोवर का आत्मदाह
शाहजहानपुर में एक नया दुखद अध्याय खुला जब एक और परिवार ऋण शार्कों के जाल में फंसकर बर्बाद हो गया। सचिन ग्रोवर, जो एक हैंडलूम व्यवसायी थे, ने धीरज के साथ जीवन जीने की कोशिश की, लेकिन अंततः उद्यमिता क कष्टदायक यात्रा ने उनके लिए असहनीय हो गई। सचिन ने एक बार रोजगार सृजन के सपने देखे थे, लेकिन इसके बदले में वे वित्तीय संकट और मानसिक दबाव में आ गए।
सचिन ग्रोवर का परिवार
सचिन का परिवार उनकी पत्नी, उनके दो भाइयों और माता के साथ था। उनके भाई, रोहित और गौरव, उनके साथ रहते थे। सचिन के पिता की मृत्यु 2009 में हुई थी, जिसके बाद परिवार का व्यवसाय सचिन और उसके भाइयों के हाथों में आ गया। पहले तो सब कुछ ठीक था। व्यवसाय बढ़ रहा था और परिवार के needs पूरी हो रही थीं, लेकिन धीरे-धीरे समस्याएँ बढ़ने लगीं।
ऋण का जाल
सचिन ने 2023 में प्रधानमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत जिला उद्योग केंद्र से 50 लाख की ऋण राशि स्वीकृत कराई थी। प्रत्येक महीने उनका एक लाख रुपये ब्याज चुकाने में चला जाता था। व्यवसाय की शुरुआत में, सचिन ने मेहनत से अपने कारखाना स्थापित किया, जिसमें वे शहर के अलावा आसपास के जिलों में माल भेजते थे। हालांकि, निरंतर व्यापारिक नुकसान ने उन्हें लगातार परेशानी में डाला।
व्यवसाय में घाटा उठाते हुए, सचिन ने ऋणदाताओं की ओर मुड़ना शुरू किया। बैंक से लेकर सूदखोरों तक, सभी ने उन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। उनकी पत्नी ने अपने आभूषण गिरवी रख दिए, लेकिन इसके बावजूद भी समस्या खत्म नहीं हुई।
सूदखोरों का आतंक
सचिन के भाई, गौरव ने बताया कि पहले सूदखोर दोस्त बनकर आते थे। वे बेहद मृदुभाषी होते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी असली पहचान सामने आ गई। जैसे ही सचिन ने 2 लाख रुपये का ऋण लिया, सूदखोर प्रति दिन 2 हजार रुपये वसूलने लगे। यह आदमी उनके पीछे पड़ गए और उन्हें मानसिक रूप से परेशान करने लगे।
सचिन की पत्नी के नाम पर पंजीकृत कार को भी सूदखोरों ने जबरन अपने कब्जे में ले लिया। यह सब कुछ सचिन और उनके परिवार के लिए बर्दाश्त से बाहर हो गया।
परिवार का दर्द
सचिन की स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि वे अपने चारों ओर एक दुखदायी संसार देखने लगे। सक्रिय रूप से काम करके भी, वह अपने कर्ज और सूदखोरों के दबाव से परेशान थे। उन पर खुद को और अपने परिवार को बचाने का जिम्मा था।
सचिन ने अपनी बुलेट बाइक भी किसी को दे दी, लेकिन उसके बाद उन्होंने अपने भाई को भी बाइक देने से मना किया। उनका भाई गौरव परेशान था क्योंकि उसने इस संदर्भ में पुलिस को भी आवेदन दिया, लेकिन पुलिस ने मौन धारण कर लिया। इस सब के बीच, सचिन ने अपनी पत्नी के साथ आत्मघाती कदम उठाने का निर्णय लिया।
ट्रैजेडी की रात
एक रात, सचिन और उनकी पत्नी ने अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय लिया, जिससे पूरे परिवार में हाहाकार मच गया। स्थानीय लोग और रिश्तेदार मौके पर एकत्र हुए। यह सब तब हुआ जब सचिन ने अपने बेटे की हत्या के बाद अत्यधिक तनाव को सहन नहीं किया।
उनकी पत्नी ने अपने पति के साथ आत्महत्या कर ली, जिससे परिवार की दुनिया एक झटके में समाप्त हो गई। सचिन और उनकी पत्नी की ऐसी दुःखद मृत्यु ने सभी को स्तब्ध कर दिया और लोगों ने इसके पीछे के कारणों पर चर्चा शुरू कर दी।
निष्कर्ष
यह घटना न केवल सचिन के परिवार के लिए एक व्यक्तिगत त्रासदी थी, बल्कि यह एक बड़ा सामाजिक मुद्दा भी बन गया। सूदखोरों का आतंक और बैंकिंग प्रणाली के दोष ने सचिन जैसे छोटे व्यवसायियों को बर्बाद किया। इस घटना ने हमारे समाज को यह सोचने पर मजबूर किया कि हमें ऐसेFinancial system को सुधारने की आवश्यकता है, जो छोटे व्यवसायियों की सहायता कर सके, न कि उन्हें बर्बाद करने का कारण बने।
अगर सरकार और समाज इस तरह के मामलों के प्रति जागरूक हो जाएं, तो शायद किसी और सचिन ग्रोवर को इस तरह के दुखद अंत का सामना नहीं करना पड़ेगा।
एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता
सच्चाई यह है कि हमें अपने समाज में ऐसी कठिनाइयों का सामना करने के लिए सामूहिक रूप से खड़ा होना होगा। सूदखोरों और अप्रत्याशित ऋणों से बचने के लिए शिक्षा और जागरूकता फैलाना आवश्यक है। केवल तभी हम सचिन जैसे लोगों के दर्द को समझ सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि ऐसी त्रासदियां भविष्य में न हों।
इस प्रकार, सचिन ग्रोवर की कहानी हमें न केवल उनकी व्यक्तिगत दुःखद यात्रा की याद दिलाती है, बल्कि हमें यह भी सिखाती है कि हमें एकजुट होकर सभी के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए।