‘मोहन भागवत का बयान: संघ मथुरा-काशी आंदोलन का समर्थन नहीं करेगा’

आरएसएस प्रमुख का बयान: राम मंदिर आंदोलन और सामाजिक समरसता पर दृष्टिकोण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में एक व्याख्यान श्रृंखला के दौरान कहा कि राम मंदिर एकमात्र ऐसा आंदोलन है जिसका संघ ने समर्थन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस अन्य आंदोलनों का समर्थन नहीं करेगा, जैसे काशी और मथुरा के स्थानों का पुनरुद्धार। हालाँकि, उन्होंने यह भी बताया कि संघ के स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से ऐसे आंदोलनों में भाग लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
सामाजिक समरसता पर भागवत ने जोर दिया कि भारत में इस्लाम हमेशा एक महत्वपूर्ण स्थान रहेगा। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच आपसी विश्वास और सहिष्णुता को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, संघ धार्मिक आधार पर किसी पर हमले में विश्वास नहीं करता है, और धर्म एक व्यक्तिगत पसंद का विषय है। इस पर, उन्होंने कहा कि प्रलोभन या जोर देना उचित नहीं है।
भागवत ने हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच की समानताओं की ओर इशारा किया, जहाँ दोनों सिर्फ पूजा के तरीकों में भिन्न हैं। उन्होंने कहा कि दोनों समुदायों को एक-दूसरे पर विश्वास करना चाहिए, और एकजुटता का कोई विशेष अर्थ नहीं है, क्योंकि वे पहले से एक हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस्लाम का इतिहास भारत में प्राचीन काल से है और आगे भी जारी रहेगा।
व्याख्यान श्रृंखला में भागवत ने सड़कों और कस्बों के नाम बदलने के मुद्दे पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि उनका अनुरोध केवल यह है कि सड़कों और कस्बों के नाम आक्रमणकारियों के नाम पर नहीं रखे जाने चाहिए। उदाहरण के लिए, उन्होंने APJ अब्दुल कलाम का नाम बदले जाने की बात की और इसे उचित ठहराया।
एक अन्य मुद्दे पर उन्होंने कहा कि देश में जनसंख्या असंतुलन का प्रमुख कारण रूपांतरण और अवैध प्रवासन है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि घुसपैठ को रोकने की कोशिश में समाज को भी योगदान देना चाहिए। उनका कहना था कि नौकरियाँ अवैध प्रवासियों के लिए नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके देशवासियों के लिए होनी चाहिए।
भागवत का यह बयान धार्मिक समरसता और सामाजिक संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने यह भी कहा कि यह आवश्यक है कि विभिन्न धर्मों के बीच संवाद बढ़ता रहे। संवाद और समझ से ही एक सशक्त और समरस समाज का निर्माण हो सकेगा।
इस प्रकार, मोहन भागवत ने अपने विचारों के माध्यम से एक समर्पित और समरस भारत की आवश्यकता का खुलासा किया है, जहाँ सभी धर्म और समुदाय मिलकर एक सम्मानजनक स्थान बना सकें। उनका उद्देश्य यह है कि विभिन्न धार्मिक एकता के साथ रह सकें, साथ ही व्यक्तिगत विश्वास का सम्मान भी हो।
भागवत के विचार, एक ओर जहाँ आरएसएस की विचारधारा को प्रकट करते हैं, वहीं दूसरी ओर यह यह संदेश भी देते हैं कि एक लोकतांत्रिक और विविधता में सम्पन्न देश में सहिष्णुता और संवाद की कितनी आवश्यकता है। इस तरह के विचार वास्तव में उन मुद्दों को संबोधित करते हैं जो आज की राजनीति और समाज में महत्वपूर्ण हैं।
आरएसएस की यह स्थिति निश्चित ही सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध हो सकती है, यदि इससे जुड़े सभी लोग उस दिशा में सार्थक रूप से कदम उठाएं। सामाजिक और धार्मिक मतभेदों को मिटाने के लिए यह आवश्यक है कि विभिन्न समुदायों के बीच संवाद कायम किया जाए।
साथ ही, भागवत ने यह महत्वपूर्ण प्रस्तावना भी की कि संघ किसी भी प्रकार के भेदभाव के खिलाफ है और सभी भारतीयों के अधिकारों और भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। यह स्पष्ट रूप से यह संकेत देता है कि आरएसएस सकारात्मक बदलाव लाने के लिए तैयार है, विशेषकर जब बात सांस्कृतिक और धार्मिक समरसता की आती है।
इस तरह, मोहन भागवत का यह बयान एक नए दृष्टिकोण को उजागर करता है, जहाँ समाज और धर्म के बीच की दीवारों को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उनका यह प्रयास समाज में एक नई चेतना का संचार कर सकता है, जो एक समतामूलक और सहिष्णु वातावरण की आवश्यकता को दर्शाता है।
अंततः, यह महत्वपूर्ण है कि हम सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाने की दिशा में कार्य करें, जहाँ धार्मिक और सांस्कृतिक भिन्नताओं को स्वीकार किया जाए और सभी को समान अधिकार मिले। यही समाज के विकास और स्थिरता का आधार है। इस दृष्टिकोण को अपनाकर हम एक अच्छे, समरस और संतुलित समाज की ओर बढ़ सकते हैं।